Sunday, 22 October 2017

bishwmanab siksha and Veda Yoga Avijan 85 dt 22/ 10/ 2017

विश्वमनावर शिक्षा और अवतरण अभिवादन (85) तिथिः- 22/10/2017 आज का विषय विषय ---- [वैद यज्ञ के माध्यम से गयत्र्री मंथन द्वारा अपना आत्मा जजग्रत किया जाता है और साथ ही साथ जुड़े रहो - आप भी देखेंगे कि संपत्ति के इस दुनिया को भी नहीं छू सकता है।]
सभी मन्त्र ही दिल में मन्दिर में सोया रहता है उसे जागरत करने के लिए साधना माध्यम से बेडे मंतर का अंत नहीं है भगवान स्वयं का कहना है कि मंत्र में मैं गयत्र्री हूं। तो जो गयत्र्री मन्त्र के साधना करते हैं यह गयत्र्री मंत्र बहुत आसान है [ओन भू भूब स्व तत सबितु बरेनें भूरो देसजि धिमहै धियोओ जो न: प्रणोदय ओह] यह गयत्र्री मंथन का अर्थ है - जो परमात्मा या निर्माता के रूप में सच्चे- छद्म-आनंद स्वोकर विराजमान, जो मेरे भीतर से सम्ष्ठान से ज्ञान और बुद्धि को हमेशा भेजा जाता है, उस प्रिसिद्ध परमात्मा के चेतना मुझे ध्यान या पूजा। इस नश्मम की पूजा करने के लिए किसी अन्य वस्तु के मन्त्र पर आत्मा का जागना नहीं है- इसलिए भगवान स्वयं इस मन्त्र पर बैठने से साधक को स्वयं के रूप में धारण करते हैं -साथक भी इस मन्त्र के द्वारा उसे आश्रय परमानन्द लोके स्थापित किया जाता है। तो सब मन्त्रों के राजा हो रहा गैतिरी मूर्ति। वेद यज्ञों के लिए बेदमाता गभिति को आत्मनिर्भर करते हुए स्वयं के सच्चे-सत्य- सुंदर और ज्योतिर्मय रूप रूप धारण करने के लिए दादा आनन्दों का स्थान होना चाहिए। यह मन्त्र का द्वार भगवान के लिए खुला है क्योंकि यह विश्वप्रकृति के बुके है। मनुष्य को सद्दीदानंद का उपसंक नहीं बन सकता है, अगर आप को मिलना चाहती है, तो कैसे वह धन्य हो सकता है और दुख से हाथ से मुक्ति हो सकती है? आसान -सरल मार्ग की तलाश में भी अगर मनुष्य को कंटकपाउणिक रास्ता जाता है तो वह कोई दिन तक पहुंच सकता है। जय बेदमाता गड़ेर्री जीत

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